गया जी/- भगवान धन्वंतरि जयंती के पावन अवसर पर भारतीय संस्कृति, सनातन परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं एवं सामाजिक मूल्यों के महत्व पर विचार-विमर्श के लिए डॉ. विवेकानंद मिश्र जी के आवास पर एक विशेष सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष एवं कौटिल्य मंच के संस्थापक डॉ. विवेकानंद मिश्र जी तथा आचार्य सचिदानंद मिश्र जी सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।सभा में भगवान धन्वंतरि जयंती के धार्मिक एवं पौराणिक महत्व, समुद्र मंथन से जुड़ी मान्यताओं तथा दीपावली पर्व के आरंभ में धनतेरस के विशेष स्थान पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई।डॉक्टर विवेकानंद मिश्र ने इस अवसर को भारतीय सनातन संस्कृति की समृद्ध परंपराओं, आस्था और शुभता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा की प्राचीन चिकित्सा आयुर्वेद केवल मानव ही नहीं संपूर्ण प्राणियों की चिकित्सा स्वास्थ्य रक्षा के कार्य में आदिकाल से आज भी निरंतर तत्पर है। फिर भी सरकार द्वारा इसकी उपेक्षा चिंतनीय है। आदि प्रवर्तक भगवान धन्वंतरि के अवतार के बाद हजारों वर्षों की चिकित्सा परंपरा चली आ रही है। सुदूर गांव में निवास करने वाली भारत की विशाल आबादी और विविध सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए आयुर्वेदिकचिकित्सा की व्यापकता सर्व सुलभता, अतीव गुणकारिता को सरकार द्वारा ईमानदारी के साथ स्वीकार करना चाहिए। आयुर्वेद अपनी विषम परिस्थिति के बावजूद भी अपनी श्रेष्ठता, उदारता,एवं कल्याणकारी भावना के कारण भारतीय परंपरा में यह दिवस सुख-समृद्धि, मंगलकामना और लोककल्याण की भावना से जुड़ा हुआ है।
इस अवसर पर दिव्य रश्मि के संपादक प्रसिद्ध समाजसेवी डॉ. राकेश दत्त मिश्रा ने अपने विचारों में भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं की निरंतरता पर विशेष बल दिया। उन्होंने इस पर्व की सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और पारिवारिक तथा सामाजिक एकता को मजबूत करने का माध्यम भी हैं। वर्तमान समय में अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूक रहना आवश्यक है। नई पीढ़ी को भारतीय इतिहास, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।आचार्य सचिदानंद मिश्र जी ने अपने विचारों में भारतीय सभ्यता, नैतिक मूल्यों और परंपरागत जीवन दर्शन की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति में प्रत्येक पर्व के पीछे कोई न कोई गहरा आध्यात्मिक, सामाजिक और नैतिक संदेश निहित होता है। भगवान धन्वंतरि जयंती हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत का स्मरण करने तथा जीवन में सद्भाव, संयम, कर्तव्यनिष्ठा और परस्पर सहयोग जैसे मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देती है। उन्होंने वर्तमान पीढ़ी से अपनी परंपराओं का सम्मान करने और उन्हें उचित समझ एवं संस्कारों के साथ अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का आह्वान किया।सभा में उपस्थित लोगों ने भी भगवान धन्वंतरि जयंती के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। चर्चा के दौरान भारतीय संस्कृति के संरक्षण, सामाजिक समरसता, पारिवारिक एकता तथा धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों को जीवन में स्थान देने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की गई।
अंत में सभा का समापन इस विचार के साथ हुआ कि भगवान धन्वंतरि जयंती केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना, आस्था और सामाजिक एकजुटता का महत्वपूर्ण अवसर है। अपनी परंपराओं के मूल भाव को समझना, उनका सम्मान करना और उनके सकारात्मक संदेशों को समाज तक पहुँचाना प्रत्येक पीढ़ी का दायित्व है।इस अवसर पर दिन प्रमुख व्यक्तियों ने अपने विचार प्रकट की है उनमें पंडित बालमुकुंद मिश्रा नेत्र रोग विशेषज्ञ कैप्टन डॉक्टर अशोक कुमार झा आचार्य अरुण मिश्रा मधुप दंत रोग विशेषज्ञ चारुमा झा आचार्य लालभूषण मिश्रा ख्याति प्राप्त आयुर्वेदिक चिकित्सा शशि शेखर पाठक डॉ ज्ञानेश भारद्वाज मुकेश गौड़ आचार्य सुनील कुमार पाठक सुनील कुमार दिलीप कुमार शंभू गिरी रश्मि मिश्रा शिवम गॉड शंभू गुर्दा प्रभास मिश्रा योगेश मिश्रा नीरज मिश्रा रणजीत मिश्रा शिव जी प्रोफेसर रीना सिंह नीलम कुमारी किरण पाठक मृदुला मिश्रा रंजीत पाठक पवन मिश्रा डिंपल कुमारी सविता देवी पार्वती देवी पुष्पा कुमारी मनीष कुमार वैद्य के के पाठक सुनील पाठक दीपक पाठक चंद्रमौली मिश्रा शीतल पुष्प लता चौबे रवि कुमार दास कुंदन मिश्रा महेश मिश्रा डॉक्टर रमेश उपाध्याय डॉ राजीव नयन मिश्रा गौरी शंकर मिश्रा सुरेंद्र उपाध्याय अमरनाथ पांडे अशोक दुबे रमाकांत मिश्रा डॉक्टर गोपी मिश्रा अजय कुमार सुनील कुमार संजय दास अभय कुमार सिंह नुसरत प्रवीण डॉक्टर ओमाना डॉक्टर चंद्रभूषण मिश्रा के अलावा कई लोग मौजूद थे।
रिपोर्ट:-प्रियाशु मिश्रा









