श्राद्ध में ज्योतिषीय दृष्टिकोण                        

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

हिंदू पंचांग के अनुसार पितृपक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष अनंत चतुर्दशी तिथि से आरंभ होकर अश्विन मास की प्रतिपदा तिथि को समाप्त होता है । यह पक्ष मातृ – पितृ,ऋषि और देव इन तीनों के ऋण से मुक्ति दिलाने वाला 17 दिवसीय पक्ष है। श्राद्ध एवं पिंडदान के लिए वेदों एवं पुराणो के अनुसार गया जी भारत की सप्त प्रमुख पुरियों में अपना एक अलग स्थान रखता है पुराणों के अनुसार यह एक मुक्तिप्रद तीर्थ स्थल है । यहां गयाजी तीर्थ की महत्ता का स्पष्ट उल्लेख है। आदि काल से ही पितृ यज्ञ की परंपरा आज भी युगा काश पर सर्व साक्षी बन जाज्ज्वल्यमान सूर्य की भांति प्रकाशमान है। सनातन धर्म में मृत प्राणियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए आश्विन कृष्ण पितृपक्षकाल अनुपम भेंट है। जन- जन्मांतर के कर्मों के परिणाम स्वरूप दु:ख भोगते प्राणियों, पूर्वजों के उद्धार के लिए गयाजी धाम सर्वश्रेष्ठ अति प्राचीन पावन तीर्थ हैं। जीवों के दुःख – बंधन को काटने पुनर्जन्म के आगमन के चक्र से मुक्ति हेतु पितृ सेवा के लिए पिंडदान एवं तर्पण शास्त्र प्रमाणित कृत्य है। इसका अकाट्य प्रमाण विभिन्न शास्त्र पुराणों वाल्मीकि रामायण आदि ग्रंथों में स्पष्ट उल्लिखित है। यह आज भी उतना ही उत्प्रेरक प्रभावी एवं फलदायी है जितना हजारों वर्ष पूर्व था।

आत्मा के द्वारा ही आत्मा का प्रशस्त मुक्ति मार्ग मिलता है। इस सृष्टि में जो कुछ भी ज्ञान कर्म और भोग कार्य चल रहे हैं इनमें कभी भी एक दूसरे के बिछड़ने का भाव नहीं है इसी में सृष्टि की सार्थकता है।

हमारा धर्म अन्य धर्मों से श्रेष्ठतम इसलिए माना जाता है कि हमारे धर्म में माता-पिता को देवतुल्य स्थान दिया गया है। जीवित अवस्था में निस्वार्थ भाव से सेवा करने की परंपरा है, वही निधन के बाद भी उनके प्रति कृतज्ञता पूर्वकश्रद्धा व्यक्त करने व श्रद्धा रखने के लिए पितरों को तर्पण तथा श्राद्धादि कार्य संपन्न करने की परंपरा हैं । श्राद्ध कर्म से देवता और पितर दोनों ही तृप्त होते हैं। श्राद्ध करने वालों के अंतःकरण की तृप्ति तथा संतुष्टि होती है। पितरों के प्रति श्रद्धा ही श्राद्ध है । श्राद्ध विधि में मंत्रों का शुद्ध उच्चारण का बड़ा प्रभाव माना गया है। श्राद्ध करने से यह भावना प्रबल होती है कि मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होगा एवं पितरों के आशीर्वाद से वंश रूपी वृक्ष पल्लवित पुष्पित होता रहेगा। ऐसी मान्यता एवं विश्वास है ।

वायु पुराण में तो स्पष्ट उल्लेख है कि ब्रह्मा जी ने कहा है कि जो मनुष्य लोग के पोषण की दृष्टि से श्राद्ध आदि करेंगे उन्हें पितृगण संतुष्टि प्रदान करेंगे।पितरों की प्रसन्नता के लिए

*”ॐ पितृ भ्यो नमः*

*ॐ पितृ देवो भव:*

*पितृ देवाय नमः”*

 

ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत चारों पुरुषार्थ धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष प्राप्ति की ही चर्चा होती है। श्राद्ध और पिंडदान का संबंध भी मोक्ष से हैं, किंतु हमारे उपनिषदों और धर्म शास्त्र के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति तभी होती है जब व्यक्ति समस्त विकारों से रहित होता है। व्यक्ति के भीतर जो विकृतियां आती है उनमें ग्रहों का योगदान भी उल्लेखनीय है। वस्तुतः जो पिंड दान करता है उसे भी विकार रहित होना चाहिए। इस दृष्टि से हम ग्रहों की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। इतना ही नहीं कहा जाता है की व्यक्ति की अतिरिक्त इच्छाएं उसके मोक्ष में भी बाधा उत्पन्न करती है ।उनके इस दृष्टिकोण से ग्रहों के प्रभाव परिणाम और उन्हें संतुलित करने की विधियों को जानना हर व्यक्ति के लिए अति महत्वपूर्ण है ताकि जीवन में संतुलन बनाया जा सके। इस दृष्टिकोण से ग्रहों के प्रभाव को इस प्रकार देखा जा सकता है । ज्योतिष ईश्वरीय प्रकाश से प्रतिपादित है। वही व्यक्ति के कृत्त कर्मो एवं विचारों के अनुसार हीं फल प्रदान करते हैं । वेद के अंगों में ज्योतिष विराट पुरुष का चक्षु है वही सूर्य है अतएव सृष्टि के सारे कार्यों के आधार ज्योतिष शास्त्र है। इसी क्रम में पितृपक्ष का श्राद्धिक कार्य भी है। विभिन्न शास्त्रों के अवलोकन से स्पष्ट है जैसे :-

ग्रहराज सूर्य के दुष्प्रभाव से होने वाले रोग सर में दर्द, नेत्र से पीड़ा, हृदय रोग और गुर्दा से संबंधित और इनके अन्य दुष्प्रभाव से बचने के लिए घोड़े को चारा, पानी देने से एवं पक्षियों में हंस, बगुला या अन्य पक्षियों के लिए दाना डालें।

मन के अधिपति चंद्रमा के दुष्प्रभाव से होने वाले रोग मन में अशांति कफ से पीड़ित नजला आदि से संबंधित और इनके अन्य दुष्प्रभाव से बचने के लिए मछलियों एवं जल के पक्षियों को दाना डालें।

मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव से होने वाले रोग खून की कमी , सुस्त सुस्त रहना सही ऊर्जा के साथ कार्य को नहीं करना एवं चोट चपेट एवं दुर्घटना का भय बना रहना और उनके अन्य दुष्प्रभाव से बचने के लिए चील, गीद्ध , बाज एवं पशु में हाथी को आहार देने से अमंगल मंगल में बदल जाता है ।

बुध ग्रह के दुष्प्रभाव से होने वाले रोग पित्त प्रकुपित होना पित्ताशय में पथरी और इनके अन्य दुष्प्रभाव से बचने के लिए कुत्ता ,बकरी ,बंदर व पक्षियों में तोता ,रेंगने वाले जीव के प्रतिनिधि ग्रह बुध हैं अतः इन पशु पक्षियों की सेवा करने से काफी लाभ होता है।

बृहस्पति ग्रह के दुष्प्रभाव से होने वाले रोग चमड़ी से संबंधित रोग होना दाद खाज खुजली पीलिया सोचने समझने की शक्ति कमजोर होना और इनके अन्य दुष्प्रभाव से बचने के लिए हाथी घोड़ा बैल एवं पक्षियों में मोर को दाना और मछलियों को आटे की गोली बनाकर किसी नदी या तालाब में डालें।

शुक्र ग्रह के अधिपति माता लक्ष्मी जी हैं। इन के दुष्प्रभाव से होने वाले रोग शरीर का पतला होना मधुमेह ,स्नायु यौन सुख में कमी धात संबंधित समस्यायें और इनके अन्य दुष्प्रभाव से बचने के लिए गौ माता एवं ब्राह्मण को भोजन कराएं। और गौरैया पक्षी के लिए दाना पानी का व्यवस्था अपने घर के छतया आंगन में करना चाहिए।

शनि ग्रह के दुष्प्रभाव से होने वाले रोग गठिया संबंधित वायु प्रकोप और इनके अन्य दुष्प्रभावों से बचने के लिए काले कुत्ते को खोवा या दूध से बनी सामग्री खिलाना चाहिए। एवं पक्षी में काग बली कराने से शनि का क्रूर प्रभाव नष्ट हो जाता है।

राहु केतु ग्रह के दुष्प्रभाव से होने वाले रोग भ्रम ,भटकाव, द्वंद की स्थिति बना रहना डरे सहमे से रहना पेट से संबंधित रोग होना (केतु- मुंह ,दांत से संबंधित )और इनके अन्य दुष्प्रभाव से बचने के लिए कुत्ते के लिए रोटी काली चिटियों के लिए आटा शक्कर मिलाकर डालें। इससे भ्रम और भटकाव की स्थिति खत्म हो जाती है।

इन मास में पीपल का वृक्ष लगाने से नवग्रहों की पीड़ा का प्रभाव कम होता है। श्राद्ध मास में किसी भी प्रकार के शुभ कार्यों को वर्जित कर देनी चाहिए।

ज्योतिषी अवधारणा ब्रह्मांड नियंता परमेश्वर ने संपूर्ण प्राणियों के व्यापक हित कल्याण के लिए सृष्टि में सारे जीव जंतु पर्यावरण और प्रकृति का उपहार भेंट किया है। इन सभी का जीवन एक दूसरे से जुड़ा है यही कारण है कि कुछ बदलाव उथल-पुथल या कोई प्राकृतिक आपदा आने वाली होती है तो पेड़ पौधे से लेकर पशु पक्षी के द्वारा उसका संकेत मिल जाता है। इसलिए इनकी रक्षा करना मानवीय धर्म है।

लेखक:- डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज

और पढ़ें