रांची/ – भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को राजनीति में एक समय ‘पार्टी विद डिफरेंस’ कहा जाता था। यह केवल एक चुनावी नारा नहीं था, बल्कि अटल-आडवाणी के दौर में पार्टी के आचरण और उसकी कार्यसंस्कृति की हकीकत थी।
भाजपा की वास्तविक आत्मा उसके वे निष्ठावान कार्यकर्ता रहे हैं, जिन्होंने बिना किसी पद या लालसा के, विपरीत परिस्थितियों में भी अपने खून-पसीने से संगठन को सींचा।
लेकिन आज राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर भाजपा जिस संगठनात्मक बदलाव से गुजर रही है, वह उसके मूल चरित्र के विपरीत है।
जब पुराने और कद्दावर नेताओं एवं निष्ठावान कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करके अन्य दलों से आए नेताओं (‘आयातित नेताओं’) को तरजीह दी जाती है, तो पार्टी के भीतर असंतोष और बगावत की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है।
जमीनी नेताओं को दरकिनार करना और दूसरी पार्टियों से आए ‘इंपोर्टेड नेताओं’ के हाथ में कमान सौंपना पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है ।
पार्टी के लिए जान न्यौछावर करने वाले
सामान्य वर्ग (सवर्ण) और वैश्य समाज को नजरअंदाज करना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए सांगठनिक और चुनावी रूप से एक बड़ा जोखिम साबित हो सकता है। ये दोनों वर्ग ऐतिहासिक रूप से भाजपा के सबसे मजबूत और पारंपरिक ‘कोर वोटर’ (Core Vote Bank) रहे हैं। जब भी इस वर्ग में असंतोष बढ़ा है, पार्टी को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े हैं।
हमारे जैसे लोगों का मानना है कि विचारधारा से समझौता करके शॉर्टकट के जरिए सत्ता हासिल करने की यह नीति भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक और कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ रही है। इतिहास गवाह है कि जिन पार्टियों ने अपने कार्यकर्ताओं का सम्मान बनाए रखा और उन्हें बांधकर रखा, उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी वापसी की। वहीं, कैडर और कार्यकर्ताओं को हल्के में लेने वाले बड़े-बड़े राजनीतिक दल हाशिए पर चले गए।
रिपोंट :- प्रियांशु मिश्रा









