ऑनलाइन पिण्डदान कार्य की सरकारी व्यवस्था पर सनातानियों का कड़ा विरोध

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गया जी में प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले के दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा की शांति और उनके उद्धार के लिए सदेह उपस्थित होकर पिंडदान करते हैं, जो हमारी सनातन परंपरा का एक अत्यंत पवित्र और पुण्यकारी कार्य है। भौतिक रूप से गया की पावन भूमि पर आकर किया गया यह कर्मकांड हमारी गहरी आस्था का प्रतीक है, लेकिन आज के इस डिजिटल दौर में कुछ लोगों और संस्थाओं द्वारा जो ऑनलाइन पिंडदान की नई प्रथा शुरू की गई है, वह पूर्णतः अनुचित और हमारे धर्म के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल खिलाफ है। हमारा शास्त्र और सनातन धर्म किसी भी रूप में इस आभासी प्रक्रिया की इजाजत नहीं देता, क्योंकि पिंडदान व्यक्तिगत संकल्प, भावनाओं और शारीरिक उपस्थिति का अत्यंत सूक्ष्म आध्यात्मिक विधान है जिसे इंटरनेट या मोबाइल स्क्रीन के माध्यम से कभी पूरा नहीं किया जा सकता।
इस गंभीर धार्मिक विसंगति और आस्था के साथ हो रहे खिलवाड़ पर विचार-विमर्श करने के लिए गया जी स्थित भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्रा के आवास पर एक विशेष और महत्वपूर्ण सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में कई गणमान्य विद्वानों, पुजारियों और बुद्धिजीवियों ने भी आभासीय एकत्रित होकर ऑनलाइन पिंडदान जैसी अशास्त्रीय और भ्रामक गतिविधियों पर अपना कड़ा विरोध दर्ज किया।
सभा की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विवेकानंद मिश्रा ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में अपना विचार रखा कि सनातन धर्म की सदियों पुरानी परंपराओं को आधुनिक सुविधा के नाम पर विकृत करना अनुचित है और पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मकांड में कर्ता की स्वयं की उपस्थिति अनिवार्य होती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यहां तीर्थ पुरोहितों से आज्ञा लेकर यह ब्राह्मण आचार्यो द्वारा हीं समस्त धर्मिक कार्य संपन्न करने की सनातन व्यवस्था है। तकनीक का उपयोग जीवन की अन्य सुविधाओं के लिए तो उचित हो सकता है, लेकिन श्राद्ध और पिंडदान जैसे संवेदनशील और पवित्र अनुष्ठानों को ऑनलाइन माध्यम से करना सीधे तौर पर हमारे पूर्वजों का अपमान है और यह प्रक्रिया केवल एक व्यावसायिक ढोंग है जिसका पुरजोर विरोध होना चाहिए।


सभा में उपस्थित प्रख्यात आचार्य सच्चिदानंद मिश्रा नैकी ने भी इस विषय पर अपना गंभीर शास्त्रीय दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने वीभिन्न धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि हमारे किसी भी वेद, पुराण या स्मृति में दूरस्थ माध्यम से पिंड दान करने का कोई उल्लेख या विधान नहीं है, क्योंकि जब तक व्यक्ति स्वयं अपने हाथों से फल्गू नदी के जल, तिल, कुश और पिंड को स्पर्श कर मंत्रोच्चार के साथ संकल्प नहीं लेता, तब तक वह तर्पण कभी फलदायी नहीं होता। उनका यह दृढ़ मत था कि यह ऑनलाइन व्यवस्था न केवल भोले-भाले श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था के साथ एक बड़ा धोखा है, बल्कि यह हमारी प्राचीन धार्मिक मर्यादाओं की नींव को भी कमजोर कर रही है, जिसे रोकना समय की सबसे बड़ी मांग है।
इस सभा के अंत में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि इस धर्म विरुद्ध कार्य को हर हाल में रोका जाना चाहिए। भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा और कौटिल्य मंच की सभा में उपस्थित सभी विद्वानों की ओर से भारत सरकार के गृह मंत्रालय, बिहार के मुख्यमंत्री, सम्राट चौधरी, गया के जिलाधिकारी और पितृपक्ष मेले के कार्यक्रम पदाधिकारी से यह विशेष और तत्काल निवेदन किया गया है कि गया जी के नाम पर चलाए जा रहे इस ऑनलाइन पिंडदान के व्यापार का तुरंत संज्ञान लिया जाए।

इन सभी से यह कड़ाई से मांग की गई है कि धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले इस कृत्य पर अविलंब रोक लगाई जाए और ऐसी सेवाएं देने वालों पर सख्ती से कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई की जाए ताकि मोक्ष भूमि गया जी की पवित्रता और पितृपक्ष की महान शास्त्रीय गरिमा को हमेशा के लिए सुरक्षित रखा जा सके।
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रिपोर्ट :-प्रियाशु मिश्रा

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